Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, Verses 31–32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, verses 31–32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
जायमानानि पुष्यन्ति परिपुष्टानि चाभितः ।
तिर्यग्गच्छन्ति चान्यानि पूर्णसर्वमयान्यपि ॥ ३१ ॥
देवमात्रैकसर्गाणि नरमात्रमयानि च ।
दैत्यवृन्दमयान्येव कृमिनिर्विवराणि च ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
कुछ उत्पन्न हो रही थीं, कुछ वृद्धि प्राप्त कर रही थीं, कुछ चारों ओर से खूब पुष्ट हो रही थी, कुछ
टेढ़ी जा रही थीं और कुछ अन्य परिपूर्ण भोग्य पदार्थों से भरी थीं