Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
परस्परमदृष्टानि मिथः खान्यमलानि च ।
नानाचारविचाराणि शून्यान्येव परस्परम् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
ये सब सर्ग अव्याकृत निर्मल आकाशमात्ररूप थे, इसलिए एक
दूसरे की दृष्टि से छिपे थे उनमें अनेक तरह के आचार और अनेक तरह के विचार थे एवं परस्पर
वे शून्यरूप थे