Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 49
अड़तालीसवाँ सर्ग समाप्त उनचासवाँ सर्ग दृढ़ विवेकज्ञान सम्पन्न पुरुषों की जैसी महिमा होती है तथा जैसा उनको संसार भासता है, उन सबका वर्णन ।
49 verse-groups
- Verse 1महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, जिनका विवेकज्ञान परिपुष्ट हो गया है ऐसे वासन…
- Verse 2उसी महत्ता का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं / औदार्य की सर्वश्रेष्ठ अवधिभूत तथा गाम्भीर्य…
- Verse 3यह सारा संसार चित्त की एकमात्र भ्रान्ति है, ऐसी सज्जनों को दृढ़ प्रतीति हो जाने पर बाहर श…
- Verse 4जब तक श्रान्तियों में सत्यत्व का अभिमान रहता है तभी तक भोगो की वासना की बुद्धि भी रहती है…
- Verse 5वासना की प्रतीति (वृत्ति) का नाश होने पर शून्य चिदाकाश ही शेष रह जाता है ओर वह वासना की श…
- Verse 6जाग्रत्, स्वप्न ओर सुषुप्ति ये जो तीन अवस्थाएँ है ये तो सभी को भलीभाँति ज्ञात है । परन्त…
- Verse 7रत्नों का किरण-जाल-सा निबिड़ित प्रभापुंज-सा आभासमात्र भासता है
- Verse 8तत्त्वज्ञानी महानुभावं की दृष्टि में यह सारा जगत् रूपों का आलोकमात्र, आकाश में विचित्र म…
- Verse 9इस संसार में न तो ये सब नाना प्रकार के जीव सत्य हैं, न यह जगत्-रूप सत्य है और न करीं शून…
- Verse 10चूँकि अनेकता नहीं है, अतः ब्रह्म की सृष्टियाँ भी नहीं हैं | चूँकि विनाशिता नहीं है, अतः प…
- Verse 11मनोराज्य आदि में संकल्यकल्पित यूताकारपदार्थों की तो शून्यता ही ग्रश्निद्ध है, पिण्डरूप से…
- Verse 12शून्यता प्रसाधन का फल कहते हैं । अवस्तुभूत उस शून्यता में विवेकी पुरुष को अहन्ता, ममता, र…
- Verse 13इस तरह संसार में पिण्डत्वादि का खण्डन हो जाने पर साररूप से सन्मात्र ही शेष रह जाता हैं, य…
- Verse 14यही कारण हे कि तत्त्वज्ञानी पुरुष जाग्रत अवस्था में भी घुक्ञप्ति मे ही स्थित रहता हैं, क्…
- Verse 15ज्ञानी का वह अवशिष्ट सन्मात्र चित्तरूप ही क्यो नहीं होगा, क्योकि चित्त के रहने पर ही चिति…
- Verses 16–18यदि सन्मात्ररूप सबका स्वरूप है, तो फिर वह सबको सुलभ क्यो नहीं है 2 यदि यह आशंका हो, तो उस…
- Verse 19वह कौन-सी युक्ति ह, यह [दिखलाते हुए उत युक्ति का फल ज्ञान है, यह बतलाते हैं। जिस अधिकारी…
- Verse 20दूसरी युक्ति बतलाते हैं । चार तरह के प्राणिसमूहों तथा पृथिवी आदि महाभूतों का एक-एक अवयव त…
- Verse 21अन्य युक्ति बतलाते हैं । इस प्रत्यगात्मा का (साक्षी चेतन का) विषयों की ओर उन्मुख होना ही…
- Verse 22यह अनर्थ के लिए कैसे उदित होता है, यह कहते हैं / संसाररूप से उदित हुआ वह बोध बाह्यरूपता क…
- Verse 23वह चिदात्मा ही अपने स्वरूप के ज्ञान से स्वप्नकाल के पदार्थों के समान पिण्डरूपता को यानी प…
- Verse 24इस तरह के हजारों विवर्तो से भी विति में अणुमात्र भी विकार नहीं आता, क्योकि वे सी नाममात्र…
- Verse 25स्वप्न में मन से पदार्थों का अवलोकन होने पर मन के ही बाहर-भीतर सर्वत्र विद्यमान रहने से ए…
- Verse 26आत्मा विकृत क्यो नहीं होता, इस पर कहते हैं । आकाश के सदृश होने से चिदात्मा भी आकाश ओर काल…
- Verse 27जड़स्वरुप बाह्य पदार्थों के आकार से विति भले ही विक्रत न हो कके, किन्तु जड़ का तो विकार ह…
- Verse 28चिदात्मा दृश्यदशा को प्राप्त नहीं होता अथवा विवर्तवश उस दृश्य स्थिति को यदि प्राप्त हो जा…
- Verse 29सर्वथा शुद्धबोधस्वरूप एक आत्मा का सप्तम भूमिका में परिणतिरूप उदय हो जाने पर बोध और अबोधरू…
- Verse 30जिस मन की भावना से यह सारा दृश्यप्रपंच ढ़ हो जाता है उसी मन की भावना से यह सार दृश्यप्रपं…
- Verse 31आकाश के सदश विशद इन सूक्ष्म चित्तों के द्वारा यह मिथ्या आधिभौतिकरूपता ऐसे भावित हुई है, ज…
- Verse 32अभ्रमता के अभ्यास से यानी सत्यस्वरूप के अभ्यास से भलीभाँति स्वरूपतः ज्ञात हुई यह सांसारिक…
- Verse 33भ्रान्ति का परिज्ञान होने से वासना स्वयं निवृत्त हो जाती है । ठीक ही है, स्वप्न का स्वप्न…
- Verse 34एकमात्र वासना के क्षय से ही यह संसार उपशान्त हो जाता है । यह वासना ही महायक्षिणी हे । विव…
- Verses 35–36पुरुषों के अभ्यास से अज्ञानप्रयुक्त उन्मत्तता जैसे उत्पन्न हुई रहती है वैसे ही ज्ञान हो ज…
- Verse 37जैसे भावना के बल से यह सूक्ष्म शरीर स्थूलरूपता को प्राप्त होता है वैसे ही विवेकी पुरुष अभ…
- Verse 38ज्ञानी महानुभाव लोग केसे इस सूक्ष्म शरीर को जीवरूपता तथा ब्रह्मरूपता प्राप्त करा देते हैं…
- Verse 39(4) परन्तु कूटस्थ बोधस्वभाव से अलग किसी भाव पदार्थ की उत्पत्ति का निरूपण हो नहीं सकता । द…
- Verse 40"तत्" पदार्थ के शोधन के लिए पहले "वाचारम्भण' न्याय से जगत् तथा इसके कारणभूत ईश्वर के स्…
- Verse 41बाह्य तथा आभ्यन्तर चित्त के बिलकुल शान्त हो जाने पर अपनी चित्स्वभावता प्रकाशित होती है, इ…
- Verse 42वही मुख्य (विश्वजित् नामक ज्ञानयज्ञ हैं, यह कहते हैं / ज्ञानी पुरुष ज्ञानरूपी यज्ञशाला म…
- Verse 43उसके सवोत्कर्व का समस्त विपत्तियों में अकम्पितरूप से” पहले वर्णन करते हैं / चाहे भले ही अ…
- Verse 44कत्र की तरह दृढ़ केराग्य एवं शान्ति चुखोत्कर्ष की स्थिरता से भी उसका वर्णन करते हैं / अनव…
- Verse 45शान्ति आदि साधनो में वैराग्य को ही सवात्कष्ट साधन वतलाते है / बाह्य पदार्थों से वैराग्य ह…
- Verses 46–47“सारी सम्पत्तियाँ आपत्तिरूप षे इस तरह की भावना से मनरूपी महातृष्णा के बीच में सर्वत्यागरू…
- Verse 48मनुष्य, नाग तथा असुर एवं उनके स्थान पर्वत तथा गुफा आदि के रूपों से वह चिति ही नाना प्रकार…
- Verse 49ब्रह्माण्ड के पात्र के अन्तर्गत स्रभी वस्तुओ में विद्व्याप्ति के अधीन स्पन्दन होने से चिद…
- Verse 50इन चार प्रकार के शरीररूपी चिति के विवर्तस्वरूप नदियों के अन्दर रहनेवाली जीवरूपी मछलियाँ म…
- Verse 51अपने स्वरूपभूत आकाशरूपी आँगन में अपने से ही घनीभूत हुई यह चिति मानों मेघ बनकर स्थित हो पृ…
- Verse 52विचित्र तरह के शब्द करने में समर्थ होते ही हैं
- Verse 53इसलिए कजरदुल्य वालनारूी पिंजडे को तोड़ देने के लिए मनुष्य को आलस्यशून्य होकर अपने पौंरुषप…