Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, Verse 49
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, verse 49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 49
संस्कृत श्लोक
वेपन्ते चिद्द्रवत्वेन ब्रह्माण्डजडभाण्डगाः ।
स्वविवर्ततरङ्गिण्यो जीवशक्त्याऽऽपतद्रसाः ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्माण्ड के पात्र के अन्तर्गत स्रभी वस्तुओ में विद्व्याप्ति के अधीन स्पन्दन होने से
चिद्विवर्तमात्रता है, इस आशय से कहते हैं ।
चित्-रूप द्रवता के कारण ब्रह्माण्डरूपी जडपात्र के अन्दर चली गई तथा जीवरूप प्राणशक्ति
से सरस बनी हुई ये चिद्विवर्तस्वरूप सम्पूर्ण प्राणियों की देहरूपी नदियाँ निरन्तर बह रही हैं