Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, Verse 14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
अनानासममेवास्ते नानारूपो विबोधवान् ।
अन्तरालीननानार्थो यथा कनकपिण्डकः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
यही कारण हे कि तत्त्वज्ञानी पुरुष जाग्रत अवस्था में भी घुक्ञप्ति मे ही स्थित रहता हैं, क्योकि
उतत समय भी उसे भासित हो रहे पदार्थों की अनेकता सन्मात्र आत्मा में ही लीन हुई रहती है, यह
द्ष्टान्त देकर बतलाते हैं /
जाग्रतअवस्था में नाना प्रकार के रूपों से सम्पन्न होने पर भी तत्त्वज्ञानी पुरुष एकरूप हो
समानभाव से सुषुप्ति में ही स्थित रहता है, क्योंकि उसकी अनेकता सन्मात्र आत्मा में ऐसे लीन हुई
रहती है, जैसे नाना प्रकार के सुवर्ण के आभूषण सुवर्णं के पिण्ड में