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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, Verse 26

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, verse 26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 26

संस्कृत श्लोक

बोधस्याकाशकल्पत्वात्कालाकाशादि तद्वपुः । पदार्थाश्चैव स्वात्मानः स्वप्नवन्नार्थरूपि खम् ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

आत्मा विकृत क्यो नहीं होता, इस पर कहते हैं । आकाश के सदृश होने से चिदात्मा भी आकाश ओर काल के समान अविकृत ही रहता है तथा उसका शरीर भी काल और आकाशरूप ही है। सभी पदार्थ चिदाकाशस्वरूप हे । वह चिदाकाशस्वप्न के समान अर्थाकार से परिणत नहीं होता