Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
उदितं वाह्यतामेति तत्र गच्छति पिण्डताम् ।
स्वयं संवेदनादेव जाड्यादम्ब्विव शैलताम् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
यह अनर्थ के लिए कैसे उदित होता है, यह कहते हैं /
संसाररूप से उदित हुआ वह बोध बाह्यरूपता को प्राप्त करता है और बाद में स्वयं संवेदन के
कारण वह साकारपिण्डरूपता को ऐसे प्राप्त हो जाता है, जैसे जड़ता के कारण जल ही जम करके
पत्थररूपता को प्राप्त हो जाता है