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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

द्वीन्दुवत्तापजलवत्केशोण्ड्रकवदम्बरे । विस्फुरन्त्यां जगद्भ्रान्तौ वासनाप्रत्ययः कुतः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

जब तक श्रान्तियों में सत्यत्व का अभिमान रहता है तभी तक भोगो की वासना की बुद्धि भी रहती है / श्रान्तियों का भान्तिरूप से स्फुरण होने पर यानी ये जयत्‌ की सारी श्रान्तियाँ वस्तुतः श्रान्तिरुप ही हैं; ऐसा ज्ञान हो जाने पर तो मूल का उच्छेद हो जाने के कारण उन वासनाओं का भी उच्छेद लोक में ग्रश्निद्ध ही हैं, यह दृष्टान्त देकर दिखलाते हैं / दो चन्द्रमा के तुल्य, मृगतृष्णा के जल के समान तथा आकाश में केशोण्ड्रक के सदृश जगत्‌ की भ्रान्ति वस्तुतः भ्रान्ति है, ऐसा तत्त्वबोध द्वारा स्फुरित हो जाने पर तत्त्वज्ञानी पुरुष को वासना की प्रतीति भला कहाँ से हो सकती है ?