Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, Verse 42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, verse 42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
ज्ञानवान्ज्ञानयज्ञस्थो ध्यानयूपं विरोपयन् ।
जगद्विजित्य जयति सर्वत्यागैकदक्षिणः ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
वही मुख्य (विश्वजित् नामक ज्ञानयज्ञ हैं, यह कहते हैं /
ज्ञानी पुरुष ज्ञानरूपी यज्ञशाला में उपस्थित होकर ध्यानरूपी अत्यन्त दृढ़ और लम्बे यज्ञस्तम्भ
को नीचे दूर तक जमीन खोदकर गाड़ता है तथा सारे संसार को जीतकर सर्वत्यागरूप मुख्य
दक्षिणा दे करके सबसे उत्कृष्ट बनकर विराजता है