Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
एवं तावद्धनीभूतः पिण्डग्राहो न विद्यते ।
संकल्पिते च व्योम्नीव शून्यतैवावगम्यते ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
मनोराज्य आदि में संकल्यकल्पित यूताकारपदार्थों की तो शून्यता ही ग्रश्निद्ध है, पिण्डरूप से
उनका ग्रहण ग्रश्निद्ध नहीं हैं, यह कहते हैं ।
सच पूछिये तो इस प्रकार कल्पना ही मूर्तिमान् जगद्रूप से भासती है। वास्तव में यहाँ घनीभूत
कोई पिण्डग्रहण नहीं है, क्योकि जैसे आकाश में एकमात्र शून्यता अवगत होती है । वैसे ही
संकल्प-कल्पित मनोराज्य आदि में एक मात्र शून्यता ही अवगत होती है