Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, Verse 43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, verse 43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
पतत्यङ्गारवर्षे च वाति वा प्रलयानिले ।
भूतले व्रजति व्योम्नि सममास्ते ज्ञ आत्मनि ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
उसके सवोत्कर्व का समस्त विपत्तियों में अकम्पितरूप से” पहले वर्णन करते हैं /
चाहे भले ही अंगारों की वृष्टि हो, प्रलयकाल की वायु बहे या यह भूतल आकाश में उड़कर चला
जाय, किन्तु हे श्रीरामचन्द्रजी, ज्ञानी पुरुष अपने स्वरूप में ही समरूप से स्थित रहता है