Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, Verse 53
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, verse 53 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 53
संस्कृत श्लोक
आहृत्य पौरुषबलान्यवजित्य तन्द्रीमुत्थाय तर्जितसमर्जितवासनौघम् ।
संसारपाशघनपञ्जरमञ्जसैव भङ्क्त्वाभ्युदेयमभितोऽज्ञसमेन भाव्यम् ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए कजरदुल्य वालनारूी पिंजडे को तोड़ देने के लिए मनुष्य को आलस्यशून्य होकर
अपने पौंरुषप्रयत्न को बढ़ाना चाहिए, उसीसे परमपुरुषार्थ की भिद्धि होती है, इसी अभिप्राय से
अब उपसंहार करते हैं
इसलिए हे श्रीरामचन्द्रजी, सर्वप्रथम अपने पौरुषबल का यानी श्रवण, मनन आदिरूप
साधनचतुष्टय का सम्पादन कर तदनन्तर ध्यान में विघ्नस्वरूप तन्द्रा को आसन, प्राणायाम आदि
के अभ्यास द्वारा जीतकर संप्रज्ञात समाधि से उठ करके निर्विकल्प असंप्रज्ञात समाधि में प्रवेश के
बाद अपने पूर्वजन्म के संचित वासनासमूहभूत संसारपाशरूपी मजबूत पिंजड़े को तत्त्वसाक्षात्कार
द्वारा शीघ्र ही तोड़कर चारों ओर से पूर्णानन्दैकरस ब्रह्मरूप से आपको उदित होना चाहिए,
अज्ञानी के समान संसार के भीतर आपको पड़े नहीं रहना चाहिए