Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, Verse 38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, verse 38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
स्ववस्तुवच्चेदुत्पत्तिर्बुध्यते बोधरूपिणी ।
तदातिवाहिकी बुद्धिः कथमित्यपि बुध्यते ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञानी महानुभाव लोग केसे इस सूक्ष्म शरीर को जीवरूपता तथा ब्रह्मरूपता प्राप्त करा देते हैं;
यह कहते हैं।
उत्पन्न हुए बाह्य तथा आध्यात्मिक भावों के प्रति जो आत्मा का अतिवहन करता है उस
वासनासमूह का नाम अतिवाह है तथा उससे उत्पन्न हुआ जो लिंग शरीर है उसको “आतिवाहिक'
कहते हैं । समस्त भाव पदार्थों के प्रथम विकार का नाम उत्पत्ति है । वह यदि विचार के बाद कूटस्थ
बोधमात्रस्वरूपिणी ज्ञात हो जाय, तो फिर वह सूक्ष्म शरीर विषयक बुद्धि कैसी है, यह भी ठीक-
ठीक ज्ञान हो जाय (&)