Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, Verse 25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
बहिरन्तश्च बोधस्य भात्यात्मैवार्थदृष्टिभिः ।
अन्तस्त्वेन बहिष्ट्वेन नैवास्य मनसो यथा ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वप्न में मन
से पदार्थों का अवलोकन होने पर मन के ही बाहर-भीतर सर्वत्र विद्यमान रहने से एकमात्र मन ही
जैसा विकृतरूप से भासता है, वैसा विकृतरूप से यह बोधात्मा अर्थदृष्टियों से बाहर-भीतर
भासमान होने पर नहीं भासता