Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 18
सनत्रहवाँ सर्ग समाप्त अठारहवाँ सर्ग सर्वत्र आकाश में पवन द्वारा उड़ाये जा रहे मृत जीव के मन में स्थित अनन्त जगत् का वर्णन ।
47 verse-groups
- Verse 1देहोऽस्त्यहन्त्वकणिकान्तरथेषद्रश्य्तवित्यरीत इति बुद्चिद्रशैव द्रष्टम्“ यह जो ऊपर कहा गय…
- Verse 2ठीक है, एला ही सही, इससे प्रक्रत मे क्या आया 2 उक्त पर कहते हैं / हे श्रीरामजी, इस तरह तत…
- Verse 3केले के स्तम्भ के भीतर-भीतर छील-छीलकर देखने से प्राप्त दल के समान एक दूसरे के ऊपर-ऊपर स्थ…
- Verse 4उक्त अर्थ की असंभावना करते हुए श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैं / श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मु…
- Verse 5महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, यह तो लोक और वेद में सब जगह प्रसिद्ध ही है कि मृत…
- Verse 6ठीक है, रहें. किन्तु वे दिशाओं में वायु द्वारा इधर-उधर केसे पहुँचाये जाते हैं ? इस पर कहत…
- Verse 7अतः आकाशवायु से विशेषतः आकृष्ट हुए उन प्राणों के अन्तर्गत एकमात्र संकल्परूप से स्थित अनेक…
- Verse 8स्फुरित हो रहे संकल्पो से परिपूर्ण प्राणवायु के सहित पवनों से इन सब दिशाओं को मैं चारों ओ…
- Verse 9यहाँ मैं देख रहा हूँ कि इस संकल्प कल्पित आँगन में मेरे सामने ये अनेक मन्दराचल और सुमेरु प…
- Verse 10आकाश में विद्यमान वायु के भीतर मृत प्राणियों के प्राण, उन प्राणों में उनका मन और उसी मन म…
- Verse 11इतने बड़े वजनदार ये जग्रत् भला कायु द्वारा कैसे उड़ाये जा रहे है, इस पर कहते हैं । आकाशव…
- Verse 12चार प्रकार के प्राणियों के तथा आकाश, पृथिवी आदि समूहों के सहित अप्रतिष्ठित ये तीनों लोक भ…
- Verse 13हे रघुनन्दन, अपने स्वप्न में देखे गये नगरसमूह के तुल्य ये संकल्पकल्पित जगत् बुद्धिचक्षु…
- Verse 14आकाश से भी अत्यन्त सूक्ष्म संकल्पकल्पित ये मनोमय जगत् सब जगह सर्वदा ही हैं और कल्पनामात्…
- Verse 15यद्यपि वे सब कल्पनामात्रसार होने से असत्यरूप ही हैं, अतः कहीं इधर उधर नहीं उड़ाये जाते, त…
- Verse 16सामने स्थित प्राणरूप नदी में वेग में प्रतिबिम्बित नगरों की ही नाई वासनामात्र होने से अनाव…
- Verse 17हे राघव, जैसे वायु में स्थित सुगंध इधर-उधर ले जायी जाती हैं वैसे ही प्राणवायु में स्थित आ…
- Verse 18यही कारण है कि तीनों जयत् के श्रमरूप से विक्त मे स्यन्दन और भेद रहने पर भी आत्मा में स्य…
- Verse 19जैसे मृत प्राणियों के प्राण में स्थित जगत् संकल्पमात्र होने से असद्रप है, इसी तरह हे श्र…
- Verse 20व्यवहार ष्टि से जगत् और इसकी रान्ति दोनों यदि वायु के भीतर उड़ते हुए ही उदित हैं; तो फिर…
- Verse 21इसीको पुन: स्पष्टरूप से बतलाते हैं । जैसे अंग में संलग्न नौका के भीतर स्थित मनुष्यों तथा…
- Verse 22इस तरह पश्येमे पुरः उल्लन्त इव मन्दरमेरवः ' इस अपनी उक्ति का श्रीरामचन्द्रजी से उपपादन कर…
- Verse 23अथवा परमाणु आदि में करहद्कय की कल्पना करके उसमे कहत् जयत् के समावेश का अनुभव नहीं करना…
- Verse 24छोटे में बड़े का समावेश वस्तुतः नहीं हो सकता; भ्रान्ति से तो हो ही सकता हैं, इस आशय से कह…
- Verse 25यूर्खों को भीतर-भीतर जयद्श्रम की भावना बनी रहे, कड हानि नहीं; परन्तु आप-जेस़े सर्व महानुभ…
- Verse 26यही कारण हैं कि सर्वजन रहते हुए भी समष्टिजीवात्मक हिरण्यगर्भ को अपने अवयवो की नाई भीतर मे…
- Verse 27परन्तु माया उपहित ईश्वर ही इस तरह देखता है, यह कहते हैं / हे श्रीरामजी, संविदात्मक, परमाक…
- Verse 28प्रलयकाल मे इश्वर अपने अन्तर्गत समस्त जग्रत् को केसे देखता है / इस आशंका पर कहते हैं। यद…
- Verse 29अधिष्ठान सद्रूप की प्रधानता से चिति या आरोपित मिट्टी आदिरूप के प्राधान्य की विवक्षा से अच…
- Verse 30उपहित के प्राधान्य से चिति या आरोपित मिट्टी आदिरूप के प्राधान्य से अचितिरूप अंकुर अपनी दे…
- Verse 31परिणामद्गष्टि स़रे जीव और ईश्वर के सृष्टि और सृष्टि के अभावकाल में जगत् के अवलोकन में दृ…
- Verse 32इस तरह श्रीरामचन्द्रजी के प्रश्नों का समाधान देकर ग्रास्रंगिक सभी बातें समाप्तकर, नाहन्त्…
- Verse 33इसीका अनुभव कराने के लिए श्रुति ओर मेने निधी के पिण्ड ओर लोहे के गोले आदि द्ष्टान्त यद्यप…
- Verse 34जो कुछ यह स्थावर-जंगमरूप जगत् दिखाई दे रहा है वह सब अपनी वास्तविक ब्रह्मभावरूप परमसूक्ष्…
- Verse 35यही कारण है कि अधिष्ठानद्ृष्टि से समस्त विवर्तो का ज्ञान से बाध होने पर सव ओर शुद्धात्मा…
- Verse 36परन्तु ज्ञान से समस्त पदार्थों का बाध न होने पर तो सर्वदा सर्वत्र सम्पूर्णा विकल्पों के र…
- Verse 37मन में भी चिति का अनुप्रवेश रहने से ही विचित्र स्रंकल्पों की ज़रामर्थ्य होती हैं; स्वतः न…
- Verse 38अज्ञानी के हृदय में जो-जो विकल्पश्री उदित होती है वह सब चिदाकाश के सर्वगामी और अनन्त होने…
- Verse 39अज्ञानी में जिस तरह विकल्पश्री उदित होती है उस तरह प्रबुद्ध में वह उदित नहीं होती, यह निश…
- Verse 40यदि विकल्पश्री असरूप ही है, तो फ़िर बाल-गोपाल तक सरी को सत्य-ी इसकी प्रतीति केंसे होती है…
- Verse 41सत्यस्वरूप यह संसार भला असत्यरूय कैसे होगा ? इस आशंका पर कहते हैं । जाग्रत् और स्वप्न के…
- Verse 42अथवा ब्रह्म वा इदमग्र् आसीत्" इत्यादि श्रुति से सत्यपुरुष में ही यह असद्रूप संसार, अपने…
- Verse 43यही कारण है कि अज्ञानद्रष्टि से ही ये जगत् इधर-उधर उड़ाये जा रहे है, तत्तवक्रष्टि से नही…
- Verse 44इस वर्णित रीति से अखिल पदार्थ-समूहों का ज्ञेयभूत अज्ञात प्रत्यगात्मरूप, परमार्थतः सर्वत्र…
- Verse 45उन्हींको विशेषरुूप से कहते हैं । ब्रह्म के सर्वशक्तिसम्पन्न होने के कारण गुण, वस्तु, क्रि…
- Verse 46अनुवृत्त वस्तु के (ब्रह्म के) स्वरूप से निरन्तर स्थर्ययुक्त भी व्यावृत्तभावविकारों के कार…
- Verse 47प्रथकृरूप से स्थित हुए इनके एकत्र मिलकर रहने में तथा एकत्र मिले हुए इनके एथकृरूप से स्थित…