Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
पश्येमे पुर उह्यन्त इव मन्दरमेरवः ।
अरूढा अपि दिग्वातैः सरिद्बिम्बितशैलवत् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
ठीक है, एला ही सही, इससे प्रक्रत मे क्या आया 2 उक्त पर कहते हैं /
हे श्रीरामजी, इस तरह तत्-तत् जीवों के संकल्प से कल्पित जगत् के भीतर स्थित हुए भी ये
मन्दराचल और सुमेरु आदि दिशाओं में वायु द्वारा सर्वत्र इधर-उधर उडाये जा रहे, नदियों में
प्रतिबिम्बित पर्वतो की नाई, मेरे आगे दिखाई दे रहे हैं, आप भी देखिये न