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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । प्राणस्याभ्यन्तरे चित्तं चित्तस्याभ्यन्तरे जगत् । विद्यते विविधाकारं बीजस्यान्तरिव द्रुमः ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, यह तो लोक और वेद में सब जगह प्रसिद्ध ही है कि मृत प्राणियों के प्राण आकाश में उत्क्रमण करते हैं । तो ऐसी दशा में यदि प्राण हैं, तो उनके भीतर चित्त और चित्त के भीतर विविधाकार जगत्‌ भी ऐसे विद्यमान हैं, जैसे कि बीज के अन्दर वृक्ष डि्स्रिकी आप संभावना कर सकते हैं)