Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 40
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, verse 40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
सर्वसंकल्पकलना सत्येत्याबालमक्षतम् ।
स्वप्नादावनुभूतोन्तरर्थः केनापि लभ्यते ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
यदि विकल्पश्री असरूप ही है, तो फ़िर बाल-गोपाल तक सरी को सत्य-ी इसकी प्रतीति
केंसे होती है, इस आशंका पर कहते हैं /
जाग्रत काल की कल्पना ही सत्य प्रतीत होती हैं, यह बात नहीं है, किन्तु स्वप्नकाल आदि
की भी सभी कल्पनाएँ सत्यरूप प्रतीत होती हैं यह बात बालक तक जानते हैं । परन्तु हे
श्रीरामजी, स्वप्न में भ्रान्ति आदि मे उपलब्ध हुए गज, रजत आदि पदार्थ किसी के भी द्वारा अपने
भीतर सत्यरूप से गृहीत नहीं होते