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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

वस्त्वल्पमप्यतिवृहल्लघुसत्त्वो हि मन्यते । मूषिकाः स्वाञ्जलिद्रव्यं नवपङ्कमिवार्भकाः ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

अथवा परमाणु आदि में करहद्कय की कल्पना करके उसमे कहत्‌ जयत्‌ के समावेश का अनुभव नहीं करना चाहिए, इस आशय से कहते हैं। तुच्छ विचारवान्‌ पुरुष छोटी-सी भी वस्तु को बहुत बड़ी मान बैठता है, जैसे कि रत्नों के भण्डार में प्रविष्ट हुई धनसम्बन्धशून्य मूषिकाएँ (चूहियाँ) रत्नों को बहुत नहीं मानतीं, किन्तु सिर्फ एक अंजलीभर अन्न को ही वहाँ अपने बड़े भाग्य से प्राप्त हुआ बहुत समझती हैं अथवा छोटे-छोटे बच्चे पहने हुए अपने बहुमूल्य आभरणों को भी अधिक आदर की दृष्टि से नहीं देखते, किन्तु मृग या पक्षी के आकार के बने हुए नवीन नानाविध रंगों से रंगें गये चमकते हुए मिट्टी के पिण्ड को ही अपने खेलने की बहुत बड़ी चीज समझते हैं जिससे कि वे उस मिट्टी के खिलौने से लुब्ध होकर अपने बहुमूल्य आभरणों को भी उसके बदले में दे डालते हैं