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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 45

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, verse 45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 45

संस्कृत श्लोक

सर्वत्वात्परमचितेरनन्तरूपाण्यारम्भप्रचुरदिगन्तसंभृतानि । लोलाम्बूदरपुरबिम्बभङ्गुराणि स्वान्तःस्थाविरलमहापुरोपमानि ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

उन्हींको विशेषरुूप से कहते हैं । ब्रह्म के सर्वशक्तिसम्पन्न होने के कारण गुण, वस्तु, क्रिया ओर जात्यादि से अनन्तरूप, नानाविध कार्यों का आरम्भ किये हुए दिगन्तों में संस्थित जनों से परिपूर्ण, चंचल जलाशय के भीतर प्रतिबिम्बित नगर के समान क्षणभंगुर अतएव अपने अन्तःकरण में स्थित, सम्पूर्णं सामग्रियों से भरे देव, गंधर्व आदि के नगरों के समान ये सब संसार हैं