Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
तान्येव दृढभावत्वात्स्वेषु लोकेषु तेष्वलम् ।
सत्यान्येव चिदंशस्य सर्वगत्वाद्भवानिव ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
यद्यपि वे सब कल्पनामात्रसार होने से असत्यरूप ही हैं, अतः कहीं इधर उधर नहीं
उड़ाये जाते, तथापि वे उन तत्-तत् जीवों के भोग्यरूप अपने अपने स्वर्ग, नरक, पृथिवी आदि
लोकों में उनका दृढ़भाव होने के कारण एवं सुख, दुःख आदि भोगो की क्रिया में समर्थ होने
के कारण सत्यरूप ही है क्योकि उनकी सत्यता के सम्पादक अधिष्ठान चिदंश तो सर्वगामी
ही है । इसलिए हे रघुनन्दन, जिस तरह मेरी दृष्टि से श्रवण आदि अर्थक्रिया में समर्थ मेरे
सामने आप सत्यरूप दिखते हैं उसी तरह ये भी दिखते हैं