Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 46
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, verse 46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
सस्थैर्याण्यपि सततं क्षणक्षयाणि व्यक्ताक्षाण्यपि सततं निमीलितानि ।
सालोकान्यपि परितस्तमोवृतानि चिद्रूपार्णवलहरीविवर्तनानि ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
अनुवृत्त वस्तु के (ब्रह्म के)
स्वरूप से निरन्तर स्थर्ययुक्त भी व्यावृत्तभावविकारों के कारण क्षणभंगुर एवं जाग्रत्अवस्था में
व्यक्ताक्ष (इन्द्रियों से प्रकट हुए) भी निमीलित (तत्त्वतः अप्रकट) तथा आत्मज्योति से प्रकाशयुक्त
होने पर भी उसके अज्ञानरूपी तम से आवृत होने के कारण चारों ओर अन्धकार से आवृत हुए ये
संसार चिद्रूपी समुद्र के तरगों के विवर्तनरूप हैं