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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

चिद्वाचिद्वा यथादर्शो बिम्बितं वाप्यबिम्बितम् । नगरं वेत्ति नो वापि तथा ब्रह्म जगत्त्रयम् ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

परिणामद्गष्टि स़रे जीव और ईश्वर के सृष्टि और सृष्टि के अभावकाल में जगत्‌ के अवलोकन में दृष्टान्त कहकर विवर्तद्रष्टि से भी कहते हैं / जैसे चिति या अचितिरूप दर्पण बिम्बित या प्रतिबिम्बित नगर को अपने भीतर जानता है वैसे ही ब्रह्म भी तीनों जगत्‌ को जीव और ईश्वर की उपाधि से उपहित दृष्टि से जानता है तथा अनुपहित शुद्ध दृष्टि से नहीं भी जानता है (७)