Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, verse 35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
सर्वसंवेदनत्यागे शुद्धसंस्पन्ददे पदे ।
न मनागपि भेदोऽस्ति निःसङ्गोपलकोशवत् ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
यही कारण है कि अधिष्ठानद्ृष्टि से समस्त विवर्तो का ज्ञान से बाध होने पर सव ओर
शुद्धात्मा का प्रसार करनेवाले पूर्ण पद में किसी तरह से तनिक भी जीव जयत् का भेद नहीं
हैं, यह कहते हैं /
सम्पूर्ण पदार्थ का ज्ञान से वाध होने पर शुद्ध संस्पन्दन प्रदान करनेवाले आत्मपद में निःसंग
पाषाणकोष की नाई तनिक भी भेद नहीं है