Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, verse 42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
असत्यताभिधं सत्यं मुक्त एव भवेच्छिवः ।
सातिवाहिकदेहैकपरिक्षयविकासवान् ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
अथवा ब्रह्म वा इदमग्र् आसीत्" इत्यादि श्रुति से सत्यपुरुष में ही यह असद्रूप संसार,
अपने अबोध के कारण, भले ही बना रहे, तथापि वह पुरुष तो नित्यमुक्त ही कहा गया है क्योकि
जिस तरह तत्त्वज्ञान के पहले सत्यस्वरूप वह ब्रह्म अपनी सत्यता को जगत् में संक्रमितकर स्वयं
सत्यत्वनाम को प्राप्त होता है, वैसे ही तत्त्वज्ञान के बाद भी वह बाधित हुए जगत् से अपनी सत्ता
को अपने ही में उपसंहार करके उसके असत्य नाम को भी स्वयं प्राप्त होता है इसीलिए यह
निश्चित है कि अधिष्ठानमात्र के परिशेष से अन्य दूसरी कोई प्रपंच की असत्यता कदापि नहीं कही
जा सकती, क्योंकि आतिवाहिक देह के सहित अकेले एकमात्र अपने ज्ञान का परिक्षय होने पर
पूर्णतारूप विकास से युक्त प्रत्यगात्मा ही शिवस्वरूप शेष रह जाता है