Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 37

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

अचित्त्वान्नास्ति मनसि संकल्पः ख इवाङ्कुरः । चित्त्वात्तु चेतसो विद्धि चितिरेवेह कल्पनम् ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

मन में भी चिति का अनुप्रवेश रहने से ही विचित्र स्रंकल्पों की ज़रामर्थ्य होती हैं; स्वतः नही; इसलिए यह निश्चित है कि विति में ही सम्पूर्ण विवर्त की स्वतन्त्रता निहित है, यह कहते हैं । आकाश में अंकुर की नाई चिति का अभाव रहने पर मन में किसी तरह का संकल्प नहीं उठता । चिति के उसमें अधिष्ठित रहने से ही नाना प्रकार से संकल्प मन में उठते रहते हैं, इसलिए हे श्रीरामजी, आप यह जान लीजिये कि इस संसार में जितनी कल्पनाएँ मन में उदित होती हैं वे सबकी सब चिति स्वरूप ही हे