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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 21

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 21

संस्कृत श्लोक

यथा स्पन्दोऽङ्गलग्नायां नाव्यन्तःसंस्थितैरपि । न लक्ष्यते तथा पृथ्व्यां तत्संस्थैस्तन्मयैरपि ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

इसीको पुन: स्पष्टरूप से बतलाते हैं । जैसे अंग में संलग्न नौका के भीतर स्थित मनुष्यों तथा उसमें जटित कील आदिकों को उसकी गति लक्षित नहीं होती, वैसे ही पृथिवी के भीतर स्थित पार्थिव देहादिमय होते हुए भी हम लोगों को इसकी गति लक्षित्‌ नहीं होती