Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, verse 43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
जगन्ति वातैरुह्यन्ते व्योम्नि शाल्मलितूलवत् ।
नोह्यन्ते चोपलानीव न च सन्त्येव कल्पनात् ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
यही कारण है कि अज्ञानद्रष्टि से ही ये जगत् इधर-उधर उड़ाये जा रहे है, तत्तवक्रष्टि से नहीं
यह जो पहले कला हैं, उसका अब उपर्सहार करते है /
इसलिए सेमल की रुई के समान आकाश में ये जगत् इधर-उधर वायु द्वारा उड़ाये जा रहें हैं,
यह उक्ति भी अज्ञानियों की दृष्टि से ही है । परमार्थ में तो कल्पनामात्र होने से न तो ये जगत् हैं
और न पत्थर की तरह इधर-उधर वायु द्वारा उड़ाये जा रहें हँ