Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
उपर्युपर्यन्तरतः कदलीदलपीठवत् ।
श्लिष्टाश्लिष्टस्वरूपाः खे मिथः संसृतयः स्थिताः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
केले के स्तम्भ के
भीतर-भीतर छील-छीलकर देखने से प्राप्त दल के समान एक दूसरे के ऊपर-ऊपर स्थित हुए
समान अदृष्टवाले जीवों के परस्पर मिले हुए तथा भिन्न अदृष्टवालों के न मिले हुए भी आकाश में
अनेक संसार अवस्थित दिखाई देते हैं