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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 46

पैंतालीसवाँ सर्ग समाप्त छियालीसवाँ सर्म चित्रकार के मन की कल्पना से चित्रित, कमलिनीवन से शोभित शिलागर्भ की नाई प्रपंचरूप आभास से युक्त ब्रह्म का वर्णन ।

38 verse-groups

  1. Verses 1–2श्रीरामचन्द्रजी अपना उक्त बिल्वोपाख्यान का तात्पर्य ज्ञान दिखलाते है । श्रीरामचन्द्रजी ने…
  2. Verse 3महाराज वसिष्ठजी कहते हैँ । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, जिस प्रकार ब्रह्माण्डरूप प…
  3. Verse 4चैतन्यात्मक उस बिल्वफल की ब्रह्माण्ड आदि जगत्‌-स्थिति मज्जा है, ऐसा कहने पर किसीको यह भरम…
  4. Verse 5तब मज्जाशब्द किंपरक है यानी किसका वाचक है ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि विवर्त-स्वरूप चमत…
  5. Verse 6उक्त दृष्टान्त का ही विवरण करने के लिए ब्रह्मशिलाख्यान की भूमिका बाँधते हैं। चन्द्र से बढ…
  6. Verse 7चित्त-प्रेम का आस्पद होने से स्निग्ध (चिकनी), स्वयंप्रकाश होने से स्पष्ट प्रतीयमान सुख ही…
  7. Verse 8उस महा-शिला के भीतर मनःकल्पनाओं से अनन्त वे सभी भुवनादिरूप कमल (<) वैसे विराज रहे हैं, जै…
  8. Verse 9उनमें से कुछ तो परस्पर गुँथे गये पत्तों से युक्त हैं अर्थात्‌ परस्पर सम्बद्ध हैं, कुछ परस…
  9. Verse 10उनमें कुछ नीचे मुँहवाले हैं, कुछ ऊर्ध्वमुखवाले भी हैं और कुछ तिरे मुँहवाले भी हे । कुछ पर…
  10. Verse 11दिखाई पड़नेवाले पदार्थों से विपरीत भी मन की कल्पना हो सकती है, अतः यह कहते हैं। कुछ के मू…
  11. Verse 12ओर उन्हीं कमलों के समीप सैकड़ों-हजारों कमल-मुकुल के समान आकृतिवाले महाकार शंख हैं तथा विक…
  12. Verse 13(५) तीर्थयात्रा के समय शालग्राम-क्षेत्र में देखी गयी शिला का गुरुवसिष्ठजी के उपयुक्त वचन…
  13. Verse 14दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिक का सम्बन्ध आपने भलीभाँति जान लिया है, यों अनुमोदन कर रहे महर्ष…
  14. Verse 15मैंने जिस शिला का दृष्टान्त दिया है, वह आपके द्वारा देखी गयी प्राकृत शिला नहीं है, कितु ब…
  15. Verse 16श्रीरामजी, आपसे उस चितिरूप शिला का ही मैंने कथन किया है, जिसके भीतर ये सब जगत्‌ विद्यमान…
  16. Verse 17भद्र, जैसे आकाश में विपुल पवन रहता है, वैसे ही अत्यंत घनीभूत अंगोंवाली और छिद्रशून्यस्वरू…
  17. Verse 18यद्यपि मायावश उस चितिरूप शिला में स्वर्ग, पृथिवी, वायु, आकाश, पर्वत, नदियाँ ओर दिशाएँ विद…
  18. Verse 19उस शिला में जगत्‌ की ही पद्म-वनरूप से मैंने उत्प्रेक्षा की है, यह कहते हैं। इसी चितिरूप श…
  19. Verse 20तेषां च निकटे सन्ति यह जो ऊपर कहा गया है, उसका अब तात्पर्य बतलाते हैं। श्रीरामजी, जैसे पत…
  20. Verses 21–22भीतर स्थित शंख, कमल आदि आकारों से युक्त पत्थर अनेकरूप से प्रतीयमान हो रहा भी जैसे घनीभूत…
  21. Verse 23जिस प्रकार पाषाण-शिला के भीतर शिल्पी द्वारा लिखित कमल, उस शिलाकोश से अभिन्न होने पर भी अप…
  22. Verse 24जैसे शिला और मिर्च के रहते शिला के भीतर कल्पित पद्म-लेखा की पंक्ति एवं मिर्च के भीतर स्थि…
  23. Verse 25जिस प्रकार सच्चरित्र पतिव्रता स्त्री के मन में उसका प्रिय पति सदैव रहता है, अथवा बिल्वफल…
  24. Verse 26भद्र, ब्रह्माण्ड के विकार आदि चैतन्यमात्रस्वरूप हैं - यह कहना अर्थशून्य है, अतः तथोक्ति व…
  25. Verse 27ओर “चिति के अनंतशक्ति होने के कारण विकार आदि की यह सृष्टि उस चिति से विकार आदि नामपूर्वक…
  26. Verse 28ये भुवन आदि विकार विकारादि अर्थो से शून्य ब्रह्मरूप ही हैं । विषयों का ग्रहण और अग्रहण भी…
  27. Verse 29विकार आदिरूप से ब्रह्म ही अवस्थित और ब्रह्म ही क्रमशः विकार आदि के रूप में उत्पन्न किया ग…
  28. Verse 30फूल से लेकर फलपर्यन्त अपने कार्यो में बीज की अनुवृत्ति दिखलाई पड़ने के कारण जैसे फूल आदि…
  29. Verse 31चिद्घन इस आत्मा में जो चिद्घनत्व है, वही तीनों जगत्‌ का बीज है; (एकत्व-कल्पना के अधीन ही…
  30. Verse 32बीज और उसके कार्य जगत की उत्पत्ति चिति से अतिरिक्त जाड्य की कल्पना से ही होती हे । चिति क…
  31. Verses 33–34जेसे महाशिला के भीतर विद्यमान अनेक तरह का भेद लेखनात्मक ही हे, वास्तव में नहीं, वैसे ही च…
  32. Verse 35जिस प्रकार रेखा एवं उपरेखाओं से संवलित एक ही स्थूलशिला दीखती है, उसी प्रकार अद्वितीय ब्रह…
  33. Verse 36(किंतु शिलामय ही है); उसी तरह जीव एवं ईश्वर का रूप ओर कर्तृत्व आदि जगत्‌ एकमात्र चैतन्यरू…
  34. Verse 37शिला के भीतर स्थित कमलों की गति एवं अगति, आविर्भाव और तिरोभाव शिला के तत्त्वसाक्षात्कार स…
  35. Verse 38वस्तुतः पर्वतकूट की नाई उत्पत्ति, उल्लास एवं विलास रूप विकारों को प्राप्त न करनेवाला ब्रह…
  36. Verse 39इसलिए जैसे शिला अनेक शिल्पियो की विविध मानसिक कल्पनाओ के रहनेपर उस-उस रूप से स्थित रहती ह…
  37. Verse 40प्रभूत भावविकारों से परिपूर्णं जो यह जगद्रूप महान्‌ भ्रम है, उसे उस प्रकार अनुन्मिषित वास…
  38. Verse 41आख्यायिका के तात्पर्य का संक्षेप मे उपसंहार करते है । श्रीरामजी, यह जगत्‌ का विलास सर्वदा…