Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, Verse 29
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, verse 29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
वर्जनावर्जनेऽर्थस्य ब्रह्मैवानन्ततावशात् ।
ब्रह्म स्थितं विकारादि ब्रह्मैवोत्पादितं क्रमात् ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
विकार आदिरूप से ब्रह्म ही अवस्थित और ब्रह्म ही क्रमशः विकार आदि के रूप में उत्पन्न
किया गया है । इस चिति-शिला के भीतर दूसरा जो यह विकारादि अर्थ प्रतीत हो रहा है, उसे आप
मृगतृष्णा जल के सदृश ही जानिए यानी उसे असद्रूप ही जानिए