Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, Verse 41
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, verse 41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
नित्यं सुषुप्तपदमेव जगद्विलासः सम्यक्प्रशान्तसमचिद्धनखात्मकत्वात् ।
पद्माः शिलान्तरिव सर्गदशास्त्वसारा दृष्टा न देहमुपयान्ति कदाचिदेव ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
आख्यायिका के तात्पर्य का संक्षेप मे उपसंहार करते है ।
श्रीरामजी, यह जगत् का विलास सर्वदा अनुन्मिषित (सुषुप्त) वासनामात्र ही हे, क्योकि वह
भलीर्भोति शांत एवं सम चिद्घन ब्रह्माकाशस्वरूप ही है । शिला के भीतर स्थित कमलो की नाई तुच्छ
सर्गादि-दशाएँ आत्मा के भीतर देखी गयी भी कभी स्वरूपस्थिति प्राप्त नहीं कर सकती