Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, Verse 9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
अन्योन्यप्रोतपत्राणि मिथो विघटितानि च ।
मिथश्चोपनिगूढानि गूढानि प्रकटानि च ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
उनमें से
कुछ तो परस्पर गुँथे गये पत्तों से युक्त हैं अर्थात् परस्पर सम्बद्ध हैं, कुछ परस्पर सम्बन्धरहित हैं और
(०0) इस ब्रह्म-शिला का आधार ब्रह्म से अतिरित कोई दूसरा कह ही नहीं सकते, अतः इस
श्लोक में “क्रचित् कहा गया है | इस विषय में यह श्रुति प्रसिद्ध है- "स भगवान् कस्मिन् प्रतिष्ठितः
स्वे महिम्नि" (वह भगवान् कहाँ प्रतिष्ठित हैं ?) (इस पर उत्तर है) अपनी महिमा में ।
(<~) प्रस्तुत श्लोक में "पद्मानि" इससे पद्मसदृश भुवनादि ही विवक्षित है, क्योकि वे भी
संकोचविकासशाली हैं और जीवरूप भ्रमरोँ के आश्रय भी हैं, यह जानना चाहिए ।
कुछ परस्पर एक-दूसरे से साक्षात् संश्लिष्ट (आलिंगित) है । वे कुछ गुप्त हैं तो कुछ प्रकट भी हैं