Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, Verse 31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
यादृशी बीजसत्ता सा भवन्ती यात्यथोत्तरम् ।
चिद्धने चिद्धनत्वं यत्स एव त्रिजगत्क्रमः ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
चिद्घन इस आत्मा में जो चिद्घनत्व है, वही तीनों जगत् का बीज है;
(एकत्व-कल्पना के अधीन ही द्वित्व-कल्पना होने से भी अकल्पित चिन्मात्र ही तत्त्त है - यह कहते
है ।) अतः चिद्घनरूप बीज और उसके कार्य जगत में एकत्व ही द्वित्व है, क्योकि एक के अभाव में दोनों
नष्ट हो जाते है