Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, Verse 39
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, verse 39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
यथा यत्र यदाकारं तथा तत्र तदेव हि ।
ब्रह्मसत्तात्मकं सर्वं सुषुप्तस्थमिव स्थितम् ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए जैसे शिला अनेक शिल्पियो की विविध मानसिक कल्पनाओ के रहनेपर उस-उस रूप से
स्थित रहती है, वैसे ही ब्रह्म भी नाना जीवो की अनेक विरुद्ध कल्पनाओं के रहने पर तत्-तत् रूप से
अवस्थित रहता है, यह कहते हैं।
जिस तरह के जिस आकार में जहाँ कल्पना की जाती है, वहाँ पर उस तरह के उस आकार में ब्रह्म
हो जाता है । यह सब जगत् ब्रह्मसत्तात्मक ही है ओर सुषुप्तस्थ की नाई स्थित है यानी जैसे प्रत्येक जीव
विचित्र स्वाप्निक विषयों की कल्पनाओं के भेदो को अविरोध से सहता है, वैसे ही वह ब्रह्म भी
कल्पनाप्रयुक्त सब भेद सहन करता हे