Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, Verses 33–34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, verses 33–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
चिदचिन्न कदाचिच्च द्वयमन्तर्मिथोऽद्वयम् ।
महाशिलान्तरे भेदो लेखात्मास्ति यथा बहुः ।
तदन्यानन्यमज्जादि चिद्धने त्रिजगत्तथा ॥ ३३ ॥
रेखोपरेखावलिता यथैका पीवरी शिला ।
तथा त्रैलोक्यवलितं ब्रह्मैकमिति दृश्यते ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
जेसे महाशिला के भीतर विद्यमान अनेक तरह का भेद लेखनात्मक ही हे,
वास्तव में नहीं, वैसे ही चिद्घन बिल्वफल में मज्जादिरूप त्रिजगत् कल्पनावश उससे भिन्न हे, वास्तव
में उससे अनन्य ही है