Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, Verses 1–2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
भगवन्सर्वसारज्ञ त्वयैषा बिल्वरूपिणी ।
महाचिद्धनसत्तेह कथितेति मतिर्मम ॥ १ ॥
चिन्मज्जारूपमखिलमहंतादीदमाततम् ।
न मनागपि भेदोऽस्ति द्वैतैक्यकलनात्मकः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी अपना उक्त बिल्वोपाख्यान का तात्पर्य ज्ञान दिखलाते है ।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : निखिल तत्त्व को जाननेवाले हे भगवन्, अभी आपने (जो बिल्वोपाख्यान
कहा है, उसमें) बिल्वफल के रूप से महाचैतन्यघन की सत्ता का ही वर्णन किया हे, ऐसा मैं समझता
हू॥१।। महर्षे, जो कुछ विस्तार को प्राप्त ये अहन्ता आदि पदार्थ हैं, वे सब चैतन्यसारस्वरूप ह,
(अतः) द्वित्व-एकत्व की कल्पनारूप भेद तनिक भी नहीं हे
सर्ग सन्दर्भ
पैंतालीसवाँ सर्ग समाप्त छियालीसवाँ सर्म चित्रकार के मन की कल्पना से चित्रित, कमलिनीवन से शोभित शिलागर्भ की नाई प्रपंचरूप आभास से युक्त ब्रह्म का वर्णन ।