Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, Verse 24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
यथा स्थिताश्चितेरन्तस्तथेयं जगदावली ।
शिलान्तः पद्मलेखाली मरिचान्तश्चमत्कृतिः ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे शिला
और मिर्च के रहते शिला के भीतर कल्पित पद्म-लेखा की पंक्ति एवं मिर्च के भीतर स्थित तीक्षणतारूप
चमत्कृति (कट्रस की स्फूर्ति) स्वाभाविक होने से न उदित (उत्पन्न) होती है और न वह अस्त (नष्ट)
ही होती है (क्योंकि अपने आश्रय शिला आदि की जब तक स्थिति रहेगी तब तक दोनों का न उदय ही
हो सकता है और न नाश ही हो सकता है); वैसे ही इस चिति में भी यह सर्ग न उदित होता है और न
अस्त ही होता है