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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, Verse 32

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

एकत्वमेतयोर्द्वित्वमेकाभावे द्वयोः क्षतिः । जगदन्यभवोद्भूतिर्न कदाचित्तदीदृशम् ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

बीज और उसके कार्य जगत की उत्पत्ति चिति से अतिरिक्त जाड्य की कल्पना से ही होती हे । चिति का वह रूप तो कभी भी जडस्वभाव हो नहीं सकता ओर न चिति ही कभी अचित्‌ हो सकती हे । अतः बिल्व के भीतर मज्जा आदि की नाई ये बीज और कार्य एक-दूसरे से अभिन्न (अद्वितीय) ही हैं