Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, Verse 15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
मया त्वियमपूर्वैव शिलेह कथिता तव ।
यस्यामन्तर्महाकुक्षौ सर्वमस्ति च नास्ति च ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
मैंने जिस शिला का दृष्टान्त दिया है, वह आपके द्वारा देखी गयी प्राकृत शिला नहीं है, कितु ब्रह्म
की ही शिलारूप से कल्पना कर प्रथमोपदिष्ट बिल्वफल की नाई, किसी अपूर्व शिला का दृष्टान्त दिया
है, इसलिए उपाय में तात्पर्य का विसंवाद होने पर भी उपेय में विसंवाद नहीं है, इस आशय से कहते है ।
भद्र, यहाँ पर मैंने यह कोई अपूर्व शिला ही दृष्टान्तरूप से आपके समक्ष उपस्थित की है, जिसकी
महाकुक्षि के भीतर यह सब प्रपंच व्यवहारकाल में विद्यमान रहता है और बाधकाल में अविद्यमान भी
(५) प्रस्तुत श्लोक में शंख शब्द से नक्षत्र, ग्रह, तारकागण आदि ज्योतिर्मण्डल ही विवक्षित हैँ,
क्योंकि समुद्र की नाई नीले आकाश में वे शंख-समूह की नाई भासते हैँ । इसी प्रकार चक्रशब्द से
मण्डलाकार द्वीप ही विवक्षित हैं, क्योंकि वे चक्रधारा की तरह आभासमान समुद्रों से उपलक्षित हँ,
यह जान लेना चाहिए ।
रहता है