Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
चितेर्मरीचबीजस्य जगदाख्या चमत्कृतिः ।
स्थिता सौषुप्तसौम्यान्तः शिलान्तःसंनिवेशवत् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
तब मज्जाशब्द किंपरक है यानी किसका वाचक है ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि विवर्त-स्वरूप
चमत्कार का ही वह वाचक है, इस आशय से कहते हैं।
मिर्च-बीज की तरह चिति की जगत्-नामक यह चमत्कृति सुषुप्ति के सदूश विकार-रहित शांत
चिति में एक शिल्पकार के मन से कल्पित शिला के अन्दर पद्म-वन की रचना की नाई, विवर्तरूप से ही
स्थित है