Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, Verses 21–22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, verses 21–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
तथास्ति तत्र तत्सर्वं संस्थानं वस्तुतो यथा ।
उपलान्तः संनिवेशो नानात्माप्येकपिण्डताम् ॥ २१ ॥
यथादत्ते तथैषा चित्पिण्डाकारैकिकां घनाम् ।
यथा पद्मः शिलाकोशादभिन्नस्तद्वपुर्मयः ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
भीतर स्थित शंख, कमल आदि आकारों से
युक्त पत्थर अनेकरूप से प्रतीयमान हो रहा भी जैसे घनीभूत एकपिण्डरूपता को स्वीकार करता है,
ऐसे ही कल्पित आकारों से युक्त होकर अनेक आकृतियों के रूप में प्रतीत हो रही भी यह चिति वास्तव
में घनीभूत एकपिण्डरूपता को ही स्वीकार करती है