Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, Verse 26
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, verse 26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
तथाऽनन्तविकाराढ्या चितौ ब्रह्माण्डमण्डली ।
विकारादि तदेवेति मुधैवोक्तिरनर्थिका ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, ब्रह्माण्ड के विकार आदि चैतन्यमात्रस्वरूप हैं - यह कहना अर्थशून्य
है, अतः तथोक्ति व्यर्थ ही है क्योंकि जब विकारी ब्रह्माण्ड चैतन्यमात्रस्वरूप है तब ब्रह्माण्ड के विकारभूत
भुवन, शरीर आदि की चिन्मात्रस्वरूपता तो अर्थतः ही सिद्ध हो जाती है, फिर अर्थशून्य होने के कारण
वैसा कहना निष्फल ही है। (कैसे अर्थशून्य है ? इस पर कहते हैं ।) चूँकि ये विकार आदि तत्क्षण ही
(ब्रह्माण्डों में चैतन्यमात्ररूपता का साक्षात्कार करने के क्षण में ही) जल में जलबिन्दु की नाई
चैतन्यमात्रस्वरूप हो जाते हैं, अणुमात्र भी उससे पृथक् नहीं रह जाते, इसलिए वह उक्ति अर्थशून्यही
है, यह भाव है