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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, Verse 19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, verse 19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 19

संस्कृत श्लोक

अस्यामेव घनाङ्गात्म जगत्पद्मं विजृम्भते । एतस्माद्वस्तुतो नान्यदन्यच्छुद्धात्मकं च वा ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

उस शिला में जगत्‌ की ही पद्म-वनरूप से मैंने उत्प्रेक्षा की है, यह कहते हैं। इसी चितिरूप शिला में घनीभूत अवयवोंवाला जगद्रूपी कमल विकसित हो रहा है । वह यद्यपि उससे पृथक्‌-सा भासित होता है; तथापि वास्तव में उससे पृथक्‌ नहीं है और न शुद्धचित्स्वरूप ही है, किंतु केवल मायारूप ही है