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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, Verse 35

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, verse 35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 35

संस्कृत श्लोक

एतच्छिलान्तरब्जादि यथा नित्यं सुषुप्तकम् । नास्तमेति न चोदेति तथाऽहंता जगद्गतिः ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

जिस प्रकार रेखा एवं उपरेखाओं से संवलित एक ही स्थूलशिला दीखती है, उसी प्रकार अद्वितीय ब्रह्म ही त्रैलोक्य से संवलित प्रसिद्ध जगत्‌-रूप से दीखता है ॥ ३ ४॥ जैसे इस लौकिक शिला के भीतर सर्वदा स्थित शिल्पी के वासनास्वरूप कमल आदि न उदित होते हैं और न अस्त ही होते हैं, वैसे ही इस चितिशिला में अहंकार ओर जगत्‌ की गति भी न उदित होती हे ओर न अस्त ही होती हे