Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 39
अडइतीस्वौँ सर्ग समाप्त (2) शंका हो कि आधी घड़ी ध्यान करने से यदि हजार अश्वमेध का फल होता है, तो एक घड़ी ध्यान करने पर उससे अधिक फल बतलाना चाहिए ।
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- Verse 1ऐसी स्थिति में एक घड़ी ध्यान का राजसूय फल कहना कैसे युक्तिसंगत होगा ? क्योकि अश्वमेध फल क…
- Verse 2यह पूजा भी ध्यानात्मिका ही है और जा रहे, बैठ रहे, जाग रहे तथा सो रहे पुरुष के सभी व्यवहार…
- Verse 3शरीर में स्थित, सन्निधिमात्र से समस्त ज्ञानं के उत्पादक एवं बोधक परमकल्याणस्वरूप इस आत्मे…
- Verses 4–6सो रहे अथवा जागे हुए, जा रहे अथवा बैठे हुए और चारों ओर स्पर्श आदि विषयों का उपभोग कर रहे…
- Verse 7प्रारब्ध के प्रवाह से प्राप्त हुए अर्थो में (भोगो में) स्थित, अशुद्धि के प्राप्त होने पर…
- Verses 8–12कोई यज्ञ प्रिय नहीं है) यह जो कहा है, उससे भी विरोध होगा । इसी प्रकार शारीरक भाष्य में भग…
- Verse 13निष्कर्षं निकालने पर यानी परमार्थतः कलाशून्य ओर व्यवहारतः कला से युक्त, देह- स्थित, हृदया…
- Verse 14उसीका विवरण करते हैं। जो मन की मननात्मिका शक्ति में अवस्थित हे; प्राण एवं अपान के मध्य मे…
- Verse 15जो शेवशास्त्र में प्रसिद्ध छत्तीस तत्त्वो के चरमस्थान में यानी अन्तिम कोटि में स्थित है;…
- Verse 16लिंग की उपासना करना चाहिए)
- Verse 17जो कलाओं की कल्पनाओं से शून्य ओर स्थूल देह रूप से परिणत भूतमात्राओं से कठिन यानी मूर्त है…
- Verse 18जो चैतन्यमात्रस्वरूप ओर निर्मल आभासस्वरूप है,जो अध्यासरूप विकल्पों का अधिष्ठान है, जो सर्…
- Verse 19जो स्वकीय प्रत्यगात्मस्वरूप है अपना स्वरूप भूल जाने के कारण जो भोगादिरूप से स्थित है ओर ज…
- Verse 20यह परम शिवस्वरूप आत्मदेव हाथ, पैर आदि अवयवो से युक्त हे, केश, नख एवं दाँतों से समलंकृत है…
- Verse 21बाह्यन्द्रियों की पृथक्-पृथक् व्यापारभूत, अतएव चित्र-विचित्र अनेक रूप, रस आदि का ग्रहण…
- Verses 22–23जिसने तीनों लोक का वृत्तान्त विज्ञापित किया है, वह मन ही उक्त प्रकारके देवस्वरूप मेरा द्व…
- Verse 24अपनी तरह दूसरों के भी प्रेम की विषय हुई ज्ञानशक्ति और प्राणशक्ति दो मेरी (जीवात्मा की) पत…
- Verse 25इस प्रकार स्वच्छ ओर अलौकिक प्रत्यक्ततत्व का परिचय प्राप्तकर देवत्व से परिपूर्णं यह जीवात्…
- Verse 26उस पूजा परिपाक के फल बतलाते है। महर्ष, वह पूजक न तो अस्त होता है और न उदित ही होता है । व…
- Verses 27–28भीतर सम ओर बाहर जीवन्मुक्तो के समान आकारवाला, सब प्राणियों के चित्त में “मेरा ही यह प्रिय…
- Verses 29–30इसका कौन-सा देव है ? और देहविनाश पर्यन्त किस प्रकार पूजा करता रहता है ? इस पर कहते हैं ।…
- Verse 31ओर अनायास प्राप्त सम्पूर्ण त्रिपुटीरूप (ज्ञाता, ज्ञेय ओर ज्ञानरूप) वस्तु से सम (रागादिशून…
- Verse 32प्राप्त हुए ब्राह्मण, क्षत्रिय, आदि रूप अपने शरीर के लिए उचित शास्त्रानुसार इन व्यवहारों…
- Verse 33अनायास प्राप्त भक्ष्य, भोज्य ओर अन्नपान से तथा विविध एश्वर्य से युक्त शयन, आसन एवं सवारी…
- Verses 34–35स्त्री, अन्न, पान आदि संभोग-सामग्री के विलास से युक्त सब प्रकार के सुखो से आत्मा को तत्त्…
- Verse 36इसी प्रकार दैव प्राप्त दुःखो का उपभोग करते समय भी आत्म-पूजा की ही बुद्धि करना चाहिए, उद्व…
- Verses 37–38प्रवाहपतितस्वरूप (प्रारब्ध-प्रवाह से प्राप्त) दरिद्रता अथवा राज्य से और चित्रविचित्र चेष्…
- Verse 39नाना प्रकार के कलहों के तरंगों एवं कामिनियों के उल्लासो से शोभित राग और द्वेष के विलास से…
- Verse 40कलह आवि के न होने में उपाय बतलाते हैं। उपेक्षा से, दया से, हृदय में नित्य प्रसन्नता से, श…
- Verse 41इसी प्रकार विषय-भोगों में लम्पट भी न होना चाहिए, इस आशय से कहते हैं। निर्निमित्त प्राप्त…
- Verse 42शास्त्र से अनिषिद्ध और निषिद्ध भोगों के सर्वदा त्याग से अथवा कहीं अनिषिद्ध भोगों में राग…
- Verse 43अयुक्तात्मा से छोड़े गये और युक्तात्मा से ग्रहण किये गये इष्ट-अनिष्ट समूहरूप विषयों से वि…
- Verses 44–45अब मुख्य पूजा का सार बतलाते हैं। नष्ट पदार्थ तो नष्ट ही हे, अतः उसकी उपेक्षा करे यानी उसक…
- Verse 46सम्पूर्ण इष्ट एवं अनिष्ट पदार्थों में सर्वदा ही परम समानता का आश्रय कर निरन्तर आत्म-पूजार…
- Verse 47जो आपाततः (ऊपर-ऊपर से यानी दृष्टिमात्र से) रमणीय (सुख या सुखसाधन) प्रतीत होता हो ओर जो आप…
- Verse 48“यह वही में हूँ” ओर “यह मैं नहीं हूँ” इस प्रकार के भेद को छोड देना चाहिए तथा “यह सब ब्रह्…
- Verse 49यथा प्राप्त सव तरह के आकाररूप विकारों से युक्त सभी प्रकारो एवं समस्त रूप और नामों से सर्व…
- Verse 50मिथ्यात्व-दुष्टि से अभीष्ट वस्तु का परित्याग कर और अनभीष्ट वस्तु का भी परित्याग कर एवं "स…
- Verse 51अप्राप्त वस्तु की इच्छा न करता हुआ और प्राप्त वस्तु को न छोड़ता हुआ स्वभावतः देव से प्राप…
- Verse 52तुच्छ यानी अपमान आदि की तथा अतुच्छ अर्थात् वध, बन्ध, सर्वस्वनाश आदि की परिस्थितियों में…
- Verse 53देश, काल ओर कर्म के सम्बन्ध से शुभ या अशुभ जो भी कोई वस्तु प्राप्त हो जाती है, किसी प्रका…
- Verses 54–55यदि शंका हो कि विचित्र दुःख, राग, द्वेष आदि विकारों की हेतुभूतः मधुर, खटी, कट, तिक्त आदि…
- Verse 56(59) इसी भाव में गीता में भी कहा है : आपपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशंति यद्रत्…
- Verse 57समतारूप अमृत से जो-जो भावित होता है, वह सब, चन्द्रमा से टपके हुए अमृत की नाई, परम मधुरता…
- Verse 58ब्रह्मैक्यदर्शनस्वरूप समता से स्वयं आकाश की तरह विकारशून्य होकर मन के लयपूर्वक जो अनायास…
- Verse 59चैतन्यमात्रस्वरूप, अद्वितीय ज्ञानी को भी पूर्णचन्द्र की नाई परिपूर्ण, समता से समानप्रकाशय…
- Verse 60भीतर आकाश की तरह विशाल ओर बाहर प्राकृत कार्यो को करनेवाला, रंजनारूप हिम से मुक्त एवं पूर्…
- Verse 61अज्ञानरूप मेघो के नष्ट होने पर स्वप्न में भी जिसमें काम आदि नहीं देखे जाते तथा जिसका अहन्…
- Verse 62आनन्दामृत से परिपूर्णं होने के कारण स्वयं चन्द्रमारूप होता हुआ भी जो अपने निष्कलंक प्रकाश…
- Verse 63विस्तारपूर्वक कही गई बातों का ही संक्षेप कर उपसंहार करते है । महर्ष, देश, काल और करण के (…