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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, Verse 56

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, verse 56 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 56

संस्कृत श्लोक

समता मधुरा रस्या रसशक्तिरतीन्द्रिया । तया यद्भावितं चेत्यममृतं तत्क्षणाद्भवेत् ॥ ५६ ॥

हिन्दी अर्थ

(59) इसी भाव में गीता में भी कहा है : आपपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशंति यद्रत्‌ । तद्रत्कामा यं प्रविशंति सर्वे स शांतिमाप्नोति न कामकामी ॥ (गीता: २.७०) एकमात्र आनन्दरसस्वरूप परह्य का विवर्त होने से अथवा समता के दर्शन से उन द्रव्य-सम्पत्तियो का अविकृतरूप से ग्रहण हो सकता है, इस आशय से कहते हैं। रसशक्ति यानी "रसो वै सः" इस श्रुति से प्रदर्शित आत्मा समता से मधुर है, आस्वादन करने योग्य है ओर अतीन्द्रिय हे । उससे जो चेत्य भावित होगा, वह तत्क्षण ही अमृततुल्य मधुर हो जायेगा