Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, Verse 41
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, verse 41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
आकस्मिकोपयातेन स्थितेनानियतेन च ।
भोगाभोगैकभोगेन प्राप्तेनात्मानमर्चयेत् ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
इसी प्रकार विषय-भोगों में लम्पट भी न होना चाहिए, इस आशय से कहते हैं।
निर्निमित्त प्राप्त और अनियत स्थित भोग-समूहों के बीच प्राप्त हुए किसी एक के किसी समय के
भोग से आत्मदेव की पूजा करे