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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, Verse 14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

मनोमननशक्तिस्थं प्राणापानान्तरोदितम् । हृत्कण्ठतालुमध्यस्थं भ्रनासापुटपीठगम् ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

उसीका विवरण करते हैं। जो मन की मननात्मिका शक्ति में अवस्थित हे; प्राण एवं अपान के मध्य में उदित है; हृदय, कण्ठ ओर तालु के मध्य में अवस्थित है अर्थात्‌ मर्मस्थान होने के कारण वहाँ विशेषरूप से अभिव्यक्त होता है तथा भौं ओर नाक के अग्रभागरूप पीठ पर आसीन है यानी वहाँ पर उपास्य है ( उस बोधरूप लिंग की उपासना करनी चाहिए)