Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, Verses 29–30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, verses 29–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
देवार्चनं करोत्येव दीर्घदीर्घमहर्निशम् ।
चित्तत्त्वचलितो देहो देवोऽस्य समुदाहृतः ॥ २९ ॥
यथाप्राप्तेन सर्वेण तमर्चयति वस्तुना ।
समया सर्वया बुद्ध्या चिन्मात्रं देवचित्परम् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
इसका कौन-सा देव है ? और देहविनाश पर्यन्त किस प्रकार पूजा करता रहता है ? इस पर कहते हैं ।
चैतन्यतत्त्व से परिचालित शरीर ही इसका देव कहा गया है